Thursday, September 29, 2011

मैं शराब हूँ....


मैं शराब हूँ....


आशिक की नशीली नज़रों के प्यालों में सजा, उसके कमसिन होठों का शरारती शबाब हूँ

माशूक की यौवन बगिया में लहराता, मचलता, अल्हड अदाओं का नाजुक सा गुलाब हूँ


मैं शराब हूँ....


मयखानों के फर्श पर गिर के टूटे हुए जाम-ए-दिल का, इक बिखरा बेजान सा ख्वाब हूँ 

जीवन के अँधेरे रास्तों में बिछे हैं बेदर्द सवाल जितने, उनका सीधा और सरल जवाब हूँ

मैं शराब हूँ....


गुमनाम ख्वाहिशों और अधूरी हसरतों के कोरे पन्नो को,अपने दामन में समेटे एक किताब हूँ

चुभन का, हर जख्म की जलन का, हर पल मरते जीवन का, सहेज के रखा हुआ हिसाब हूँ

मैं शराब हूँ....


तन्हा शामियानों में ढली हर शाम, उस खाली रखे जाम को देख, तेरे साथ जला जो वो चिराग हूँ ...
तेरी भीगी पलकों और दबी सिसकियो को ज़माने से छुपाया जिसने आज तलक, मैं वही नकाब हूँ...

मैं शराब हूँ....


नजराना हूँ मेरे कुछ खादिमों के वास्ते, रात भर तड़पती, बेचैन रूहों के लिए सुकून भरा महताब हूँ ....

तेरे लबों की हसीं हसरत हूँ, फीकी अदाओं और कम खुबसूरत बलाओं की नफरत हूँ पर लत लाजवाब हूँ .....


मैं शराब हूँ

Wednesday, September 28, 2011

बाज़ार सजा है....


बाज़ार सजा है, अरमानों की बिकवाली - उम्मीदों की दलाली के लिए.....
लगी है हर कहीं इस शहर में अपनों का गला घोंटते झूठे रिश्तों की मंडी....

रक्त वर्ण से लथपथ काया, कालिख लगाती है चेहरे पे लाली के लिए...
न बारिश की बूँदें धवल, न इनमे जल, न इन्द्रधनुष दिखे अब सतरंगी ...

स्वप्न सजाने को जीवन जलता, दिल कितने जला रहें है दिवाली के लिए....
जल गये संस्कार, व्यवहार कब के, कर्तव्यों की चिता पड़ गयी अब ठंडी..

नीड त्याग भाग रहे, रात रात भर जाग रहें, ख्वाबों की रखवाली के लिए...
उस बेशक्ल मंजिल की ओर, जहाँ ले जाती है इक अंतहीन अँधेरी पगडण्डी....

Tuesday, September 27, 2011

क्या हुई खता...


ख्वाबों की देहलीज़ पे ही सही...बैठ संग मेरे, थोडा फिर से मुस्कुरा दे..
नकाब हटा रुख से ज़रा अपने...यूँ तेरे बिन जीने की कोई तो वजह दे...

जितना रुला ले, चाहे जो सजा दे, पर मेरे अरमानों की खता तो बता दे...
कोसूं जिसे अपनी बर्बादी के वास्ते, तेरे या मेरे दिल के उस कोने का पता दे..

Monday, September 26, 2011

तेरा शहर .....

क्या कम बंदिशें हैं ज़माने की, तेरे लिए या मेरे लिए,
इन तंग दिलों की गलियों से गुजरते डर लगता है
इस बोझिल सोच के संग उड़के थक जाता हूँ जब जब
सो पाऊँ जहाँ तेरी गोद में वो हर कोना एक घर लगता है
एक अमृत अंश जो होश बक्श्ता है बेचैन रूहों को
वो जाम -ए - मोहब्बत इन्हें जाने क्यों ज़हर लगता है
सजाऊं कैसे ओ सजनी, महल तेरे सपनों का इस मिटटी पे,
तू है मेरी अपनी, पर मुझे पराया तेरा अपना शहर लगता है

Friday, September 9, 2011

हसरत-ए-इखलास

हर नगीने की चाहत अंगूठी बनना नहीं होती ..........
हर फूल गले का हार बनके सजना नहीं चाहता ..........

बस मुस्कान बढ़ाने का इरादा हो जिसके दिल में.....
वो हीरा तो पैरों की पायल में छुपकर भी है इतराता.....

इजहार-ए-इखलास

चाहे चाहने वाले बेशुमार हों यहाँ .....इस प्यारे से रोशन चाँद के ....
बस थोडा सा हक अपना चाहता हूँ.... इस मुखड़े की मुस्कान पे...

गम नहीं गर याद न आऊँ तुझे खुशियों में, जब लाखों फूल सजे हों तेरे गले....
तन्हाई ठगे कभी तो उठा लेना...फूल बन सोये होंगे हम वहीँ तेरे क़दमों तले.....

Thursday, September 1, 2011

कितने रंग हैं इस दुनिया के....

काले पीले कुछ चमकीले.....रंग हैं सब दिल के ही अपने .....
कोई है चाहत, कोई शरारत...कुछ धोखे और कुछ हैं सपने....
कितनी खुशियाँ...कितने आंसू...किसे छुपा लूं...किसे मैं बांटूं....
इतने मुखोटे इस दुनिया के...यहाँ सच्चा चेहरा कैसे छांटू...

until..i met you ...

i was walking in d crowd,
bt along wid a lonliness...
my heart was content,
bt wid a corner full of emptiness.....
had everything at my bay,
still missed a pure happiness....
had all i dreamt in my arms,
yet some nights were restless...
didn't knw the reason....
didn't have any clue...
until n unless i met you ...
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